सुजानपुर से करीब दो किलोमीटर दूर महाराजा संसार चंद की ऐतिहासिक नगरी टिहरा में स्थित प्राचीन शिव-पार्वती मंदिर आज भी लगभग 300 वर्षों के गौरवशाली इतिहास और अद्भुत शिल्पकला का साक्षी बना हुआ है। सावन माह में यह मंदिर श्रद्धालुओं की विशेष आस्था का केंद्र रहता है, जहां प्रदेश के विभिन्न जिलों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।इतिहास के अनुसार कला प्रेमी और भगवान शिव के अनन्य भक्त माने जाने वाले महाराजा संसार चंद ने अपने निवास स्थान के निकट इस मंदिर का निर्माण करवाया था। मंदिर में भगवान शिव और माता पार्वती की दुर्लभ प्रतिमा स्थापित है, जो अष्टधातु से निर्मित मानी जाती है। अधिकांश स्थानों पर भगवान शिव की पूजा शिवलिंग के रूप में होती है, जबकि यहां शिव-पार्वती की साकार प्रतिमा विराजमान है, जो इस मंदिर को विशेष पहचान प्रदान करती है।धार्मिक मान्यता है कि सावन माह में इस मंदिर में दर्शन और पूजा-अर्चना करने से भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं तथा जीवन के कष्ट दूर होते हैं। पहाड़ी की चोटी पर शांत और प्राकृतिक वातावरण के बीच स्थित यह मंदिर श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक शांति का अनुभव भी कराता है।हालांकि यह ऐतिहासिक मंदिर वर्तमान में भारतीय पुरातत्व विभाग के अधीन है, लेकिन उचित संरक्षण के अभाव में इसकी ऐतिहासिक विरासत धीरे-धीरे फीकी पड़ती जा रही है। मंदिर की दीवारों पर बनी प्राचीन चित्रकारी का रंग धूमिल हो चुका है, जबकि फर्श और अन्य हिस्सों में भी समय के साथ जर्जरता साफ दिखाई देती है। स्थानीय लोगों का कहना है कि विभाग द्वारा संरक्षण कार्य तो कराया जा रहा है, लेकिन इसकी रफ्तार बेहद धीमी है।श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों ने यह भी बताया कि मंदिर तक पहुंचने के लिए पर्याप्त दिशा-सूचक बोर्ड नहीं लगाए गए हैं, जिससे बाहरी क्षेत्रों से आने वाले श्रद्धालुओं को मंदिर तक पहुंचने में परेशानी होती है। लोगों ने पुरातत्व विभाग से मंदिर और ऐतिहासिक महल के संरक्षण कार्य में तेजी लाने, चित्रकारी का पुनरुद्धार कराने तथा श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए आवश्यक व्यवस्थाएं सुनिश्चित करने की मांग की है।सुजानपुर के राजपुरोहित पंडित आशुतोष शर्मा ने बताया कि कटोच वंश चंद्रेश कुमारी प्रत्येक वर्ष इस मंदिर में पूजा-अर्चना के लिए आती हैं। उन्होंने कहा कि मां पार्वती का यह मंदिर कटोच राजवंश की आस्था और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। उन्होंने इस ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण के लिए समय रहते प्रभावी कदम उठाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस अद्वितीय विरासत और शिल्पकला का दर्शन कर सकें।


